Khatik Samaj Hindi

From Famepedia
(Redirected from Khatik Samaj Hindi)
Jump to navigation Jump to search

Khatik
ReligionsHinduism, Jainism
LanguagesHindiPunjabiRajasthaniTamilTelugu
Country• India • Nepal • Pakistan[1][2]
Populated statesUttar Pradesh,West Bengal, Rajasthan, Madhya Pradesh, Telangana, Haryana
Notable membersJagannath Pahadia, Udit Raj, Virendra Kumar Khatik, Rajnath Sonkar Shastri
SubdivisionsSonkar, Suryavanshi, Chak, Dhangar, Are Katika, Kalal, Rangiya and Mewafarosh
Related groupsAkhil Bhartiya Khatik Samaj

खटीक जाति के इतिहास को लेकर अब तक अनेक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और उनमें हिन्दू खटीक समाज के इतिहास सम्बन्धी अनेक प्रकार की बातें कही गई हैं। लेकिन कभी हमारे समाज की समस्याओं और उनके समाधान पर किसी ने चिंतन नहीं किया यहां आप खटीक समाज की हकीकत से रूबरू होंगे और साथ ही उनकी समस्याओं व समाधान पर भी प्रकाश डाला जाएगा।

कुछ समाज चिंतकों के अनुसार खटीक जाति क्षत्रिय जाति है तो अन्य समाज चिंतक खटीक जाति को क्षत्रिय होने का पूरी तरह से खंडन करते हैं। आज हम इस पुस्तक के माध्यम से खटीक समाज के इतिहास सम्बन्धी तथ्यों पर प्रकाश डालेंगे। और खटीक समाज के व्यापारी कैसे अपने व्यवसाय को आसमान तक पहुंचा सकते हैं इसपर विस्तार से चर्चा करेंगे।

आशा करता हूँ आपको यह लेख पसंद आएगा अगर आप किसी तथ्य से सहमत नहीं हैं तो कृपया क्षमा करें इस लेख का आशय किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य खटीक समाज के इतिहास के सभी पहलुओं पर चर्चा करना है।

कौन हैं खटीक?

खटीक जाति, भारत की मूलनिवासी जाति है जो वर्तमान में अनुसूचित जाति के अंतर्गत वर्गीकृत की गई है। भारत में यह उत्तर प्रदेश, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, चंडीगढ़, पश्चिम बंगाल, बिहार और गुजरात में बसे हुए हैं। तथा व्यापक रूप से उत्तर भारत में बसा हुआ है।

प्रत्येक खटीक उपजाति का अपना मूल मिथक है, उन्हें ऐतिहासिक रूप से राजाओं द्वारा यज्ञ में पशुओं की बलि करने का कार्य सौंपा गया था। आज भी हिंदू मंदिरों में बलि के दौरान जानवरों को वध करने का अधिकार केवल खटीकों को ही है।

खटीक समाज की एक परंपरा के अनुसार खटिक शब्द का उद्गम हिंदी शब्द खट्ट से लिया गया है, जिसका मतलब है खड्ग के एक ही वार से सिर को धड़ से अलग कर देना यानि तत्काल हत्या। वे इसे शुरुआती दिनों से संबंधित करते हैं जब वे राजस्थान के राजाओं को मटन और शराब की आपूर्ति किया करते थे।

कुछ खटीक नमक और मदार के रस का इस्तेमाल भेड़ बकरी और हिरण की खाल रंगने के लिए किया करते थे।


अपने समुदाय की उत्पत्ति के बारे में परंपरा मौजूद हैं गुजरात और राजस्थान में, वे राजपूत या क्षत्रिय वंश का होने का दावा करते हैं उनका मानना है कि वे मूल रूप से योद्धा थे और मुगलकाल में राजपूतों के युद्ध हारने के बाद ध्वस्त हो गए और अपने वर्तमान व्यवसाय को अपना लिया।

राजस्थान में खटीक दावा करते है कि परशुराम (विष्णु का 6 वां अवतार) राजपूतों से बहुत क्रुद्ध था और एक तरफ से राजपूतों का संहार करता हुआ आ रहा था इसलिए खटीकों ने अपनी पहचान बदलकर अपने प्राण बचा लिए।

राजनैतिक दर्जा

16 वीं लोकसभा चुनाव -2014

16 वीं लोकसभा चुनावों के आधार पर भारत में खटीक समाज के 7 सांसद हैं। जिनके नाम हैं:-

  1. मनोज राजौरिया,
  2. विनोद सोनकर,
  3. डॉक्टर उदित राज,
  4. वीरेंद्र कुमार खटीक,
  5. नीलम सोनकर,
  6. डॉक्टर भोला सिंह और
  7. कृपाल बालाजी तुमाने

17 वीं लोकसभा चुनाव -2019

  1. मनोज राजौरिया
  2. भोला सिंह
  3. विनोद सोनकर
  4. अनिल फिरोजिया
  5. कृपाल बालाजी
  6. वीरेंद्र खटीक


भाषा और रहन सहन

खटीक अपनी क्षेत्रीय भाषा बोलते हैं गुजरात में गुजराती बोलते हैं, जबकि आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में, मराठी उनकी पहली भाषा है। वे उत्तर प्रदेश में हिंदी बोलते हैं, राजस्थान में स्थानीय राजस्थानी भाषा बोलते हैं। हरियाणा में हरियाणवी और बिहार में भोजपुरी बोलते हैं।

खटीक स्वयं को चमार, बाल्मीकी, लोहार और कंजर से श्रेष्ठ मानते हैं उनके साथ कोई व्यवहार नहीं रखते हैं, लेकिन बनिया (व्यापारी), ब्राह्मण (पुजारी), राजपूत (योद्धा) और जाट से निम्न मानते हैं।

खटीक समाज को भारत में कहीं अनुसूचित जाति तो कहीं ओबीसी की सूची में रखा गया है। अनुसूचित जाति प्रमाणपत्र के जरिये वे बहुत से सरकारी लाभ ले पाते हैं जैसे स्कूल कालेज में कम फीस देना। सरकारी नौकरी में आवेदन करना। एवं विधानसभा, लोकसभा चुनावों में उम्मीदवार के रूप में अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना।

संयुक्त परिवार खटीकों में आम है लेकिन वे अलग-अलग भी रहने लगे हैं। खटीक जाति के लोग केवल अपने समुदाय के भीतर ही शादी करते हैं वे बहुत ही पारंपरिक तरीके से रहते हैं। शादी के लिए परिवार के बड़े सदस्य ही बातचीत करते हैं उसके बाद वयस्क विवाह का आयोजन किया जाता है। महिलाएं विवाह प्रतीकों के तौर पर चूड़ियाँ, सिंदूर, माथे पर बिंदी, उंगली, कान, नाक और पैर की अंगुली में छल्ले या अंगूठी पहनती हैं और साड़ी पहनती हैं।

खटीकों में साक्षरता स्तर कम है। यही मुख्य वजह है कि खटीक समाज के लोग बहुत कम संख्या में उच्च अधिकारी हैं। इसलिए उनको शिक्षा की बहुत जरूरत है, विशेषकर लड़कियों को अवश्य पढ़ाया जाना चाहिए।

खटीक शब्द “आखेटक” का ही अपभ्रंश है जिसका अर्थ होता है शिकारी या शिकार करने वाला।

पशुओं की बलि करते समय खट्ट से एक ही वार में सिर को धड़ से अलग कर देने के कारण ही खटीक नाम पड़ा ऐसा माना जाता है।

इतिहास से मिले साक्ष्यों के अनुसार खटीक जाति का मुख्य व्यवसाय पशुओं की बलि देना होता था, खटीक जाति एक वीर जाति होती है जो जंगली जानवरों का शिकार करके तथा पालतू भेड़ बकरियों के मांस द्वारा राजाओं की सेना के लिए मीट की आपूर्ति व भोजन का प्रबंध किया करते थे। NK Kadam ने अपनी पुस्तक The Meaning of the Ambedkarite Conversion to Buddhism and Other Essays में साफ साफ लिखा है कि खटीक की ड्यूटी पशुओं का वध करना होता था।

पॉपुलर प्रकाशन की गुजरात भाग-1 में वध करने वाले यानि कसाई और मांस बेचने वाले को खटीक बताया गया है।

आज भी देशभर में खटीक जाति के लोग मीट का व्यवसाय करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं। इनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को देखते हुए भारत देश के कुछ राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश व दिल्ली में हिन्दू खटीक समाज को अनुसूचित जाति का दर्जा मिला हुआ है।

खटीक भेड़ – बकरियों व घोड़ों को पालते थे, जिनके समूह को “सूर्यवँशी खटीक” के नाम सम्बोधित किया जाता है। ये घोड़ागाड़ी (ताँगा) चलाकर अपनी गुजर बसर किया करते थे।

पूर्व में खटीक जाति के साथ छुआछात की जाती रही है जिसके कारण खटीक समाज अपेक्षाकृत प्रगति नहीं कर सका और आर्थिक रूप से कमजोर रहा। लेकिन जैसे जैसे समाज शिक्षा प्राप्त कर रहा है वैसे वैसे समाज की आर्थिक स्थिति सुधरती जा रही है, आज के समय में खटीक जाति के लोग हर क्षेत्र में बेहतर कार्य कर रहे हैं व ऊंचे पदों पर कार्यरत हैं।

खटीकों का मूल निवास

खटीक मूलरूप से भारत के राजस्थान राज्य के निवासी माने जाते हैं तथा राजस्थान से ही रोजी-रोजगार की खोज में पूरे भारत में फैल गए और वहीं जाकर बस गए। इसीलिए उनका रहन सहन यहां तक गोत्र भी क्षत्रियों के समान है।

अगर खटीक क्षत्रिय नहीं थे तो कुछ खटीकों के पास धन दौलत कैसे होती थी?

खटीक शुरू से ही भेड़ बकरियों का व्यवसाय करते थे। भेड़ बकरियाँ पालते-पालते उनके पास हजार, दो हजार और कभी कभी तो 5 हजार तक भेड़ बकरियों की संख्या हो जाती थी। वे उनकी खाल और बाल बेचते थे। दूसरे समाज के लोगों को ब्याज पर पैसे देते थे जिसके कारण वे धनी हो जाते थे।

आखेटक से बने खटीक

खटीक को आखेटक के रूप में पहचान कैसे मिली?

खटीक जाति भेड़ बकरियों को पालने से पहले जंगली जानवरों का शिकार किया करती थी। राजा महाराजों को शिकार करना पसंद होता था इसलिए खटीकों यानि आखेटकों को शिकार करने में मदद करने के लिए अपने साथ ले जाते थे। खटीक तलवार के एक ही वार से पशु का सिर धड़ से अलग कर देते थे जिससे उनका नाम खट्ट से खट्टिक और फिर खटिक पड़ गया। खटीक पशु को मारने और पाप से बचने के लिए काली की पूजा करते और काली पर पशु बलि चढ़ाते थे। जो आज भी कायम है।

खटीक समाज के श्री उदयसिंह टुंडेले जी ने अपनी पुस्तक में साफ साफ शब्दों में खटीक को आखेटक यानि शिकारी बताया है।

हम खटीक इसलिए कहलाते हैं क्योंकि प्राचीन काल में वनों में रहने वाले हमारे पूर्वजों ने आखेट का व्यवसाय अपनाया था। उस समय आवश्यकता से अधिक मांस इकट्ठा कर लिया जाता था लेकिन भंडारण की कोई व्यवस्था नहीं होती थी तथा मुद्रा का चलन भी नहीं था इसलिए मांस और फलों को अन्य वस्तु खरीदने के लिए इस्तेमाल में लाया जाता था।

फिर जैसे जैसे वन खत्म होने लगे गावों का निर्माण होने लगा तो आखेटकों ने समयानुसार अपने व्यवसाय में परिवर्तन तो किया लेकिन अब वे आखेट करने के बजाय पशुओं भेड़ बकरियों को पालने लगे और उनके मांस व फल आदि को बेचने लगे। संस्कृत भाषा में भी खट्टिक शब्द मौजूद है जिसका अर्थ होता है शिकारी। अब संस्कृत तो प्राचीन भाषा है यह कोई बाद में तो बनाई नहीं गई इसलिए खटिक शब्द का अर्थ शिकारी है यह स्वत् ही प्रमाणित हो जाता है। आखेटक से खेटक, और फिर खेटक से खटिक बने। फिर क्षेत्रीय भाषा अंतर के कारण कहीं खटीक तो कहीं खटिक पुकारा जाने लगा।

जो खटीक लोग शुद्ध रूप से फलों का ही व्यापार करते थे उन्हें मुगलकाल में मेवाफरोश के नाम से जाना गया क्योंकि फलों को मेवा की श्रेणी प्राप्त है और उर्दू फ़ारसी में व्यापार करने वालों को फरोश कहते हैं। आज पूरे भारत में फैली यह जाति मेवाफरोश के नाम से प्रसिद्ध है लेकिन खटीक जाति के अंतर्गत ही आती है।

श्री रामदास सोनकर पूर्व आई ए एस ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि खटिक कौन है इस प्रश्न का सीधा उत्तर है - खटिक मांस और फल- सब्जी बेचने वाली जाति है जो पूरे भारत में पाई जाती है और सर्वत्र खटिक या खटीक नाम से जानी जाती है। कुछ राज्यों में यह अनुसूचित जाति है तो कुछ राज्यों में यह पिछड़ी जातियों में आती है। उन्होंने इस विषय पर अन्य 10 लेखकों के मत भी प्रकाशित किये हैं।

खटीक दलित हैं या क्षत्रिय?

खटीकों के क्षत्रिय होने के कोई ठोस प्रमाण ना मिल पाने के कारण इस बारे में कुछ भी कह पाना सम्भव नहीं है। खटीकों ने कभी भी निम्न जातियों के समान कार्य (जैसे मैला ढोना, मृत पशुओं को उठाना) नहीं किये जिससे उनकी तुलना निम्न जातियों से नहीं की जानी चाहिए, हालांकि खटीक जाति को बकरे काटने और मीट बेचने जैसे कार्यों के कारण हीन भावना से देखा जाता रहा है कहीं कहीं तो उन्हें कसाई शब्द से संबोधित किया जाता है। और यही कारण है कि खटीक जाति के साथ छुआछूत किये जाने के कारण इनको 'अनुसूचित जाति' की श्रेणी में दर्ज किया गया है।

कुछ विद्वानों द्वारा सूर्यवँशी खटीक समाज के 360 प्रमुख गोत्र निर्धारित किये गए हैं इनमें चन्देल, पंवार, चौहान, बड़गुजर, राजौरा, बुंदेला आदि ऐसे गोत्र हैं जो राजपूतों में भी पाए जाते हैं। इसलिए कुछ लोगों का मानना है कि खटीक समाज भी राजपूत होते हैं लेकिन अभी तक इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं मिल पाने के कारण यह एक बहस का मुद्दा बना हुआ है।

खटीक समाज के कुछ दलित चिंतकों का मानना है अगर खटीक भी राजपूत होते तो राजपूतों द्वारा खटीकों के साथ रोटी बेटी का व्यवहार अवश्य किया जाता। और राजपूतों के समारोहों, आयोजनों में खटीकों को भी आमंत्रित किया जाता।

360 गोत्रीय क्षत्रिय खटीक क्या है?

यह पूर्णतया मूर्खतापूर्ण विषय है सभी खटीक एकसमान हैं उनमें भेदभाव करने और उन्हें बांटने के उद्देश्य से कुछ राजनीतिज्ञों ने चालाकी से 360 गोत्रीय खटीकों को क्षत्रिय खटीक साबित करने के लिए इस तरह का नामकरण किया है।

कुछ तुच्छ मानसिकता वाले लोगों ने अन्य समाज में झूठा सम्मान पाने के लिए ऐसा किया हो।

इतिहास में 360 गोत्रीय जैसी कोई चीज ही नहीं थी। असल बात यह है कि खटीकों के जो गोत्र क्षत्रियों से मिलते जुलते हैं उन गोत्रों को 360 गोत्रीय नाम देकर इन खटीकों को अन्य खटीकों से श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की गई है जो सर्वथा अनुचित है।

इतिहास में क्षत्रियों के 1100 गोत्रों का वर्णन है उनमें से 360 गोत्र ऐसे हैं जो क्षत्रियों से मिलते जुलते हैं इसका यह मतलब नहीं है कि खटीक भी क्षत्रिय हैं क्योंकि क्या जिन खटीकों के गोत्र इस 360 गोत्रों वाली सूची में नहीं है क्या वे क्षत्रिय नहीं हैं? क्या अन्य खटीक कहीं दूसरे ग्रह से उत्पन्न हुए हैं? या आसमान से उतरे हैं? क्या जिन खटीकों के गोत्र 360 गोत्रों में नहीं आते वे घटिया क्वालिटी के खटीक होते हैं? जब सब खटीक आजीविका चलाने के लिए एक ही कार्य करते हैं तो सबके साथ भेदभाव करना कहाँ तक सही है? दरअसल जिन लोगों के पास थोड़ा बहुत पैसा आ जाता है वे अपनी सामाजिक स्थिति को उच्च बनाने के उद्देश्य से खटीक शब्द से पीछा छुड़ाने की कोशिश करने लगते हैं। वैसे इस सोच को वैज्ञानिक दृष्टि से “हीनभावना” कहा जाता है।

अगर खटीक भी क्षत्रिय होते तो उनकी शादी भी क्षत्रियों के घरों में होती। क्षत्रिय अपने समारोहों, बैठकों, आयोजनों में खटीकों को भी आमंत्रित करते लेकिन ऐसा नहीं होता है। इसी ऊंच नींच के कारण आज हमारी खुद की खटीक जाति अनेक खेमों में बंट गई है व आपस में भेदभाव करती है। अगर हम सभी खटीकों को एकसमान मानें और एकता से रहें आपस में रोटी बेटी का सम्बंध रखें तो हमारा समाज बहुत शक्तिशाली बन सकता है।

लेकिन असल बात यह है कि हमें शिक्षित होना होगा अगर हम शिक्षित होंगे बुराइयों और कुरीतियों से दूर रहेंगे तो हमारे समाज का विकास स्वयम ही हो जाएगा। आप दूसरे समाज का उदाहरण भी देख सकते हैं जो पहले छुआछूत का शिकार होते थे लेकिन आज अपनी शिक्षा के दम पर देश के सर्वोच्च पदों पर बैठे हुए हैं। इसीलिए कहा गया है स्वदेशे पुज्यते राजा, विद्वान सर्वत्र पूज्यते। अर्थात राजा तो सिर्फ उसके राज्य में ही पूजा जाता है लेकिन विद्वान अपने गुणों और ज्ञान की बदौलत पूरी दुनियां में पूजा जाता है।


धार्मिक मान्यता

अधिकांश खटीक हिंदू हैं और सभी प्रमुख हिंदू देवताओं और देवी की पूजा करते हैं। खटीक विभिन्न क्षेत्रीय देवताओं का बहुत सम्मान करते हैं और बुरी आत्माओं में विश्वास करते हैं। पूर्वजों की पूजा करना उनके विश्वास प्रणाली का एक अतिरिक्त हिस्सा है।

बड़ी संख्या में खटीक सभी प्रमुख हिंदू त्योहारों जैसे जन्माष्टमी (कृष्णा के जन्मदिन), नवरात्री (9 रातों का त्योहार), दिवाली (दीपक का त्योहार) और होली (रंगों का त्योहार) का जश्न मनाते हैं।

हिंदू खटीक मरने वालों का अंतिम संस्कार पूर्ण हिन्दू रीति रिवाज से करते हैं और राख को गंगा नदी में विसर्जित करते हैं। मुस्लिम खटीक मरने वालों को दफनाते हैं। मुस्लिम खटीक मस्जिदों की यात्रा करते हैं और ईद और मुहर्रम जैसे मुस्लिम त्योहार मनाते हैं। सिख खटीक गुरुनानक के जन्मदिन, लोहड़ी (फसल त्योहार), मनाते हैं और गुरुद्वारों की यात्रा करना पसंद करते हैं।

हिंदू खटीक भैरों और सिद्ध मसानी की पूजा करते है वे दुर्गा के रूप में आस्था रखते हैं उत्तर प्रदेश में चामड़ को पूजा जाता है जो हिन्दू धर्म के अनुसार दुर्गा का ही एक रूप माना जाता है।

“महाकाली उत्सव” खटीक समाज का प्रमुख त्योहार है इस दिन खटीक समाज द्वारा बकरों की बलि और महाकाली की पूजा और विसर्जन किया जाता है।

झांसी और कलकत्ते में खटिकयाने का ‘महाकाली उत्सव’ काफी प्रसिद्ध है। हर साल दशहरे के दिन यहां लाखों लोग महाकाली उत्सव के दर्शन करने के लिए देश के कोने कोने से सम्मिलित होते हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि कलकत्ते और झांसी के खटिकयाने में “महाकाली उत्सव” के दौरान खटीक समाज द्वारा 1 ही दिन में लगभग 1100 बकरों की बलि दी जाती है। माना जाता है कि यहां जो मांगों वही मिलता है फिर मनोकामना पूरी होने पर बकरे की बलि चढ़ाई जाती है।

काली माता के विसर्जन के साथ खटीक समाज विजयदशमी को शस्त्र पूजन का आयोजन करते हैं परंतु इतिहास के जानकार व्यक्तियों द्वारा गुमराह कर हमें अपने पथ से विमुख कर दिया आप सभी से विशेष आग्रह है कि क्षत्रियों की निशानी शस्त्र होते हैं और विजयदशमी के दिन शस्त्रों की पूजा अवश्य करनी चाहिए।

खट्वांग और खटीक

आजकल हमारे समाज में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने नाम के साथ सूर्यवंशी, क्षत्रिय, राजपूत जैसे शब्द लगा रहे हैं। इन्हें लगता है कि शब्दों को नाम के साथ लगाने मात्र से ये क्षत्रिय बन जाएंगे इनका ऐसा सोचना सिर्फ इनकी क्षत्रिय बनने की भूख को शांत कर सकता है लेकिन अगर ये चाहें कि क्षत्रियों में इनकी शादियां होने लगें तो ऐसा कभी नहीं हो सकता। ऐसे लोगों से पूछने पर वे खुद को महाराजा खट्वांग का वंशज बताते हैं। मैं इनसे पूछना चाहता हूँ क्या रामायण या किसी वेद पुराण में ऐसा लिखा है कि खटीक, खट्वांग के ही वंशज हैं?

राम आर्य वंश के थे इसलिए बहुत से खटीक अपने नाम के साथ आर्य लिखने लगे हैं जबकि आर्यों की तरह नियमित हवन आदि करने से इनका कोई लेना देना नहीं है। इतिहास उठाकर देखें तो हम पाएंगे कि आर्य तो ब्राह्मणों को कहते हैं जो विदेशों से भारत आये थे और उन्होंने भारत की बोली भाली मूलजातियों को दबाये रखने के षड्यंत्र रचे। और भारत में छुआछूत का जहर घोला जो आज भी कायम है। इनके जहर का ही फल है कि एक ही जाति के भाई भाई भी ऊंच नींच में बदल चुके हैं।

मध्यप्रदेश के श्री उदयसिंह टुंडेले जी ने इस विषय पर वर्षों शोध किया और अनेक पुस्तकों का गहन अध्ययन किया, घंटों इंटरनेट पर समय बिताने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे कि राजा खट्वांग का खटीक समाज से कोई लेना देना नहीं है। इन दोनों शब्दों के पहले दो अक्षर ‘खट’ शब्द का मिलना महज एक संयोग है।

सर्वप्रथम भदकारिया जी ने अपनी पुस्तक में 360 गोत्रों और खट्वांग का जिक्र किया था उन्होंने बिना कोई पुस्तक पढ़े सिर्फ कुछ ब्राह्मणों के कहे अनुसार, और बुजुर्गों द्वारा बताई गई कहानियों अनुसार सबकुछ अपनी पुस्तक में छाप दिया था। खट्वांग को खटीक समाज का पूर्वज मानना और कथित 360 गोत्रों को क्षत्रिय मानना महज एक सोची समझी चाल थी समाज को गुमराह करने की साजिश थी। राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ के लिए, सामाजिक रूप से अपनी छवि बनाने के लिए इस तरह के विचारों को जन्म दिया था जो वैज्ञानिक दृष्टि से सच नहीं हैं और जिसका जिक्र किसी भी वेद, पुराण में नहीं है, खट्वांग को खटीक समाज का पूर्वज बताना और 360 गोत्रों को क्षत्रिय बताना सिर्फ सुनी सुनाई बातों पर आधारित है। आज भी कुछ खटीक समाज के राजनेता चंदा इकट्ठा करके खट्वांग की जयंती मनाते हैं और पार्टी में अपनी छवि चमकाते हैं। असल में उन्हें खटीक समाज के विकास से कोई लेना देना नहीं होता है।

कुछ लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज महाराणा प्रताप की सेना में थे। और जब वे राजा युद्ध हार गए तो हमारा समाज भी बुरी तरह बिखर गया। अगर ये बात सच है तो आज भी सेना में हमारा कोई विशेष प्रतिनिधित्व नहीं है जबकि हमारे समाज की भी सेना में टुकड़ी होनी चाहिए थी कहाँ गया हमारी रगों में बहने वाला योद्धाओं का रक्त? असल बात तो यह है कि हमारे पूर्वज न तो कभी कहीं के राजा रहे न कोई जमींदार रहे । हमारे समाज की जो भी थोड़ी बहुत तरक्की हुई है आजादी के बाद पढ़ लिख जाने के बाद ही हुई है।

अब तो अनेक निचले तबके के समाज हैं जो सूर्यवंशी लिखने लगे हैं लेकिन उनका खटीक समाज से कोई लेना देना नहीं है। यह सिर्फ समाज में खुद को सम्मान दिलाने के लिए किया जाता है। लेकिन अगर हमें असल रूप में सम्मान चाहिए तो पढ़ना लिखना बहुत ही आवश्यक है।

दक्षिण भारत में कुछ खटीक संस्थाओं ने 2007 में सरकार के सामने यह अपील की थी कि खटीक शब्द के कारण उन्हें उचित सम्मान नहीं मिल पा रहा है और चूंकि यह समाज सूर्य की उपासना करता है इसलिए हमारे समाज का नाम बदलकर सूर्यवंशी कर दिया जाए। लेकिन सरकार ने 2008 में इसे अस्वीकार कर दिया। उसके बाद भी खटीक समाज के लोग सूर्यवंशी शब्द को इस्तेमाल करते रहे।

खटीक ही क्यों करते हैं काली की पूजा?

खटीक समाज के लोग प्राचीनकाल में शिकार करके अपना पेट भरते थे शिकार करने को आखेट भी कहते हैं और शिकारी को आखेटक। इसलिए धीरे धीरे हमारा नाम आखेटक से खटीक हो गया।

हम जंगली जानवरों का शिकार करते अपना पेट भरते और हिरनों का शिकार करके उनकी छालों को रंगकर बेचते थे। राजा महाराजा हमारी बहादुरी और शिकार कौशल से वाकिफ थे इसलिए वे आखेटकों को अपने साथ शिकार पर ले जाया करते थे, इससे वे निडर होकर शिकार करते थे। जब कोई विदेशी हमारे राजा के राज्य पर आक्रमण करता था तो आखेटक ही अपने राजा की मदद करते थे चूंकि वे शस्त्र कौशल में निपुण होते थे इसलिए जीतते भी थे।

वनों के नष्ट होने से हमने जंगली जानवरों का शिकार करना तो छोड़ दिया लेकिन उस समय हमें कोई काम नहीं आता था इसलिए हम भेड़ बकरियों को पालने का काम करने लगे।

राजा की सेना के लिए मांस की आपूर्ति आखेटक ही करते थे। चूंकि जीव हत्या पाप होता है इसलिए हम पहले काली माता के चरणों में बलि देकर उन्हें प्रसन्न करते थे।

जब कभी हमारी भेड़ बकरियों में महामारी फैलती थी तो हम काली माता के आगे बलि चढ़ाते थे तो महामारी रुक जाती थी और हमारा नुकसान होने से बच जाता था।

भेड़ बकरियां चराते चराते हम दूर तक निकल जाते थे इस तरह हम पूरे भारत में फैल गए। हमारे पास हजारों भेड़ हो जाती थीं जिनके बाल बेचकर, और भेड़ बकरियों का मांस बेचकर हम धनवान होते गए जिसके कारण हममें अकड़ आती गई।

यज्ञ आदि में खटीक ही बलि देने का कार्य करते थे, काली के मंदिर में खटीक ही पुजारी होता है। राजा महाराजाओं के साथ रहते रहते हम उनके गुणों को अपनाते रहे और धीरे धीरे खुद को क्षत्रिय ही मानने लगे

कुंडेश्वर मंदिर पर था खटीक समाज का आधिपत्य।

कुंडेश्वर में बना शिवधाम मंदिर पूरे देश में प्रसिद्ध है। माना जाता है कि यह शिवलिंग सैकड़ों साल पहले जमीन से प्रकट हुआ था।

प्रचलित कथानुसार, हजारों सालों पहले यहां पर एक पहाड़ी हुआ करती थी जहां पर खटीक जाति के लोग निवास करते थे, वहीं पर एक महिला ओखली में धान कूट रही थी तभी जमीन से अचानक भारी मात्रा में खून निकलने लगा और महिला घबरा कर ओखली पर मूसल रख लोगों को बुलाने चली गई और जब लोगों ने आकर देखा तो कुंडे के नीचे शिवलिंग प्रकट हुआ था। तभी से इनका नाम कुंडेश्वर भगवान हो गया।

शुरुआती दौर में खटीक समाज के लोगों ने मंदिर के आसपास तरह तरह की दुकानें लगाना आरम्भ कर दिया लेकिन आपसी फूट के कारण अन्य समाज के लोग भी वहां जाकर बसने लगे और बाजार पर कब्जा कर लिया। धीरे धीरे मंदिर को अन्य लोगों ने कब्जा लिया।

यह शिवलिंग प्रति साल चावल नुमा आकर में बढ़ता है और मोटा भी होता है यह एक पंच मुखी शिवलिंग है जो लोगों के कष्टों को हरता है यहां पर दर्शन करने हजारों की संख्या में भक्तगण करने आते हैं। सावन सोमवार को तो यहां की छटा ही अद्भुत होती है, श्रावण मास में भोले नाथ का अभिषेक करना विशेष फलकारी माना जाता है।


बिजय सोनकर शास्त्री की हिन्दू खटीक जाति

बिजय सोनकर शास्त्री जी ने अपनी पुस्तक हिन्दू खटीक जाति – उत्थान एवं पतन में खटीक समाज को ब्राह्मण बताया है जो पूरी तरह से अंधविश्वास पर आधारित है। अगर खटीक ब्राह्मण थे तो आज के ब्राह्मण कौन हैं? अगर सभी ब्राह्मण ही थे तो इतनी लड़ाई और दुश्मनी क्यों? लेखक द्वारा इस पुस्तक में जो कुछ भी लिखा गया है उससे प्रतीत होता है कि लेखक ने एक राजनीतिक पार्टी में अपनी छवि बनाने और पार्टी की दलित प्रेमी विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए ही पुस्तक में खटीक को हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग यानि ब्राह्मण बताने पर जोर दिया है। खैर आइए उस पुस्तक के कुछ प्रमुख अंशों पर प्रकाश डालते हैं।

खटिक जाति मूल रूप से वो ब्राहमण जाति है, जिनका काम आदि काल में याज्ञिक पशु बलि देना होता था। आदि काल में यज्ञ में बकरे की बलि दी जाती थी। संस्कृत में इनके लिए शब्द है, ‘खटिटक’। जिसका अर्थ होता है कसाई।

मध्यकाल में जब क्रूर इस्लामी अक्रांताओं ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया तो सबसे पहले खटिक जाति के ब्राहमणों ने ही उनका प्रतिकार किया। राजा व उनकी सेना को तो बाद में सूचना मिलती थी। मंदिर परिसर में रहने वाले खटिक ही सर्वप्रथम उनका सामना करते थे।

तैमूरलंग को दीपालपुर और अजोधन दोनों स्थानों पर सर्वप्रथम खटिक योद्धाओं ने ही रोका था और सिकंदर को भारत में प्रवेश से रोकने वाली सेना में भी सबसे अधिक खटिक जाति के ही योद्धा थे। तैमूर खटिकों के प्रतिरोध से इतना भयभीत हुआ कि उसने सोते हुए हजारों खटिक सैनिकों की हत्या करवा दी और एक लाख सैनिकों के सिर का ढेर लगवाकर उस पर रमजान की तेरहवीं तारीख पर नमाज अदा की।

मध्यकालीन बर्बर दिल्ली सल्तनत में गुलाम, तुर्क, लोदी वंश और मुगल शासनकाल में जब अत्याचारों की मारी हिंदू जाति मौत या इस्लाम का चुनाव कर रही थी तो खटिक जाति ने अपने धर्म की रक्षा और बहू बेटियों को मुगलों की गंदी नजर से बचाने के लिए अपने घर के आसपास सूअर बांधना शुरू किया। इस्लाम में सूअर को हराम माना गया है। मुगल तो इसे देखना भी हराम समझते थे। और खटिकों ने मुस्लिम शासकों से बचाव के लिए सूअर पालन शुरू कर दिया। उसे उन्होंने हिंदू के देवता विष्णु के वराह (सूअर) अवतार के रूप में लिया।

मुस्लिमों की गौ हत्या के जवाब में खटिकों ने सूअर का मांस बेचना शुरू कर दिया और धीरे धीरे यह स्थिति आई कि वह अपने ही हिंदू समाज में पददलित होते चले गए। यानि कल के शूरवीर ब्राहण आज अछूत और दलित श्रेणी में हैं।

1857 की लडाई में मेरठ व उसके आसपास अंग्रेजों के पूरे के पूरे परिवारों को मौत के घाट उतारने वालों में खटिक समाज सबसे आगे था। इससे गुस्साए अंग्रेजों ने 1891 में पूरी खटिक जाति को ही वांटेड और अपराधी जाति घोषित कर दिया।

जब आप मेरठ से लेकर कानपुर तक 1857 के विद्रोह की दासतान पढेंगे तो रोंगटे खडे हो जाए्ंगे। जैसे को तैसा पर चलते हुए खटिक जाति ने न केवल अंग्रेज अधिकारियों, बल्कि उनकी पत्नी बच्चों को इस निर्दयता से मारा कि अंग्रेज थर्रा उठे। क्रांति को कुचलने के बाद अंग्रेजों ने खटिकों के गांव के गांव को सामूहिक रूप से फांसी दे दिया गया और बाद में उन्हें अपराधि जाति घोषित कर समाज के एक कोने में ढकेल दिया।

आजादी से पूर्व जब मोहम्मद अली जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन की घोषणा की थी तो मुस्लिमों ने कोलकाता शहर में हिंदुओं का नरसंहार शुरू किया, लेकिन एक दो दिन में ही पासा पलट गया और खटिक जाति ने मुस्लिमों का इतना भयंकर नरसंहार किया कि बंगाल के मुस्लिम लीग के मंत्री ने सार्वसार्वजनिक रूप से कहा कि हमसे भूल हो गई। बाद में इसी का बदला मुसलमानों ने बंग्लादेश में स्थित नोआखाली में लिया।

आज हम आप खटिकों को अछूत मानते हैं, क्योंकि हमें उनका सही इतिहास नहीं बताया गया है, उसे दबा दिया गया है। आप यह जान लीजिए कि दलित शब्द का सबसे पहले प्रयोग अंग्रेजों ने 1931 की जनगणना में ‘डिप्रेस्ड क्लास’ के रूप में किया था। उसे ही बाबा साहब अंबेडकर ने अछूत के स्थान पर दलित शब्द में तब्दील कर दिया। इससे पूर्व पूरे भारतीय इतिहास व साहित्य में ‘दलित’ शब्द का उल्लेख कहीं नहीं मिलता है।

हमने और आपने मुस्लिमों के डर से अपना धर्म नहीं छोड़ने वाले, हिंसा और सूअर पालन के जरिए इस्लामी आक्रांताओं का कठोर प्रतिकार करने वाले एक शूरवीर ब्राहमण खटिक जाति को आज दलित वर्ग में रखकर अछूत की तरह व्यवहार किया है और आज भी कर रहे हैं।

भारत में 1000 ईस्वी में केवल 1 फीसदी अछूत जाति थी, लेकिन मुगल वंश की समाप्ति होते-होते इनकी संख्या 14 फीसदी हो गई। आखिर कैसे..? सबसे अधिक इन अनुसूचित जातियों के लोग आज के उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, मध्य भारत में है, जहां मुगलों के शासन का सीधा हस्तक्षेप था और जहां सबसे अधिक धर्मांतरण हुआ। आज सबसे अधिक मुस्लिम आबादी भी इन्हीं प्रदेशों में है, जो धर्मांतरित हो गये थे।

डॉ सुब्रहमनियन स्वामी लिखते हैं, ” अनुसूचित जाति उन्हीं बहादुर ब्राह्मण व क्षत्रियों के वंशज है, जिन्होंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, लेकिन मुगलों के जबरन धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया। आज के हिंदू समाज को उनका शुक्रगुजार होना चाहिए, उन्हें कोटिश: प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन लोगों ने हिंदू के भगवा ध्वज को कभी झुकने नहीं दिया, भले ही स्वयं अपमान व दमन झेला।”

प्रोफेसर शेरिंग ने भी अपनी पुस्तक “Hindu Tribes & Castes” में स्पष्ट रूप से लिखा है कि ” भारत के निम्न जाति के लोग कोई और नहीं, बल्कि ब्राहमण और क्षत्रिय ही हैं।”

स्टेनले राइस ने अपनी पुस्तक “हिन्दू कस्टम्स एण्ड देयर ओरिजिन्स” में यह भी लिखा है कि अछूत मानी जाने वाली जातियों में प्राय: वे बहादुर जातियां भी हैं, जो मुगलों से हारीं तथा उन्हें अपमानित करने के लिए मुसलमानों ने अपने मनमाने काम करवाए थे। यदि आज हम बचे हुए हैं तो अपने इन्हीं अनुसूचित जाति के भाईयों के कारण जिन्होंने नीच कर्म करना तो स्वीकार किया, लेकिन इस्लाम को नहीं अपनाया।

आज भारत में 23 करोड़ मुसलमान हैं और लगभग 35 करोड़ अनुसूचित जातियों के लोग हैं। जरा सोचिये इन लोगों ने भी मुगल अत्याचारों के आगे हार मान ली होती और मुसलमान बन गये होते तो आज भारत में मुस्लिम जनसंख्या 50 करोड़ के पार होती और आज भारत एक मुस्लिम राष्ट्र बन चुका होता।

यहाँ भी जेहाद का बोलबाला होता और ईराक, सीरिया, सोमालिया, पाकिस्तान और अफगानिस्तान आदि देशों की तरह बम-धमाके, मार-काट और खून-खराबे का माहौल होता। हम हिन्दू या तो मार डाले जाते या फिर धर्मान्तरित कर दिये जाते या फिर हमें काफिर के रूप में अत्यंत ही गलीज जिन्दगी मिलती।

खटीक समाज में धर्म परिवर्तन

खटीक जाति कार्यों के आधार पर कई प्रकार की उपजातियों में बंटी हुई है उन्हीं में से एक हैं सोनकर।

मुगलकाल में इस्लाम अपनाने के लिए हिंदुओं पर अत्याचार किया जाता था उन्हें जबरन मुस्लिम बनाया जाता था जो हिन्दू इसका विरोध करता था उसको मौत के घाट उतार दिया जाता था। ‘राजपूत’ इस अत्याचार के सबसे ज्यादा शिकार हुए। यही वजह है कि आज भी मुस्लिमों में चौहान, सोलंकी इत्यादि गोत्र पाए जाते हैं।

बल्कि अंग्रेजों के समय में भी लड़ाका किस्म की, आसानी से हार न मानने वाली, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने वाली सभी जातियों पर बदला लेने, उनके आत्मसम्मान को तोड़ने के लिए तरह तरह के जुल्म किये गए इन जातियों को आदतन अपराधी, लुटेरा घोषित कर दिया गया।

कुछ हिन्दू खटीकों ने इसका तोड़ निकाला, उन्होंने अपने घर के आंगन में पालतू जानवरों की जगह सूअर बांधना शुरू कर दिया। मुस्लिम आक्रांताओं से अपने परिवार की बहू बेटियों की इज्जत बचाने के लिए बहुत से खटीकों ने सूकर पालन शुरू कर दिया और सुअर के मांस का ही व्यापार करना शुरू कर दिया। ताकि मुस्लिम आक्रांताओं को अपने घर से दूर रखा जा सके। इन खटीकों को बाद में “ख़ल्लु खटीक” नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान में इन्हें सोनकर नाम से जाना जाता है।

चूंकि इस्लाम में सूअर हराम है। मुस्लिम लोग सूअर से छू जाने से भी खुद को अपवित्र मानते हैं। इस तरह उन खटीकों ने अपने धर्म को परिवर्तित होने से बचा लिया और वर्तमान में उनको सोनकर नाम से जाना जाता है। चूंकि सोनकर मांस का कार्य करते थे इसलिए अन्य खटीक इनको हेय दृष्टि से देखते हैं यही कारण है कि खटीक समाज एकजुट नहीं हो पा रहा है। जबकि सोनकर समाज अपने पुराने पुश्तैनी कार्यों को छोड़ चुका है और शिक्षित होकर काफी आगे निकल चुका है।

सूर्यवँशी और सोनकर आपस में शादी ब्याह करने से परहेज करते हैं उम्मीद है कि शिक्षा के जरिये दोनों वर्ग अपनी रूढ़िवादी सोच को बदलेंगे व फिर से आपस में शादी ब्याह करने लगेंगे।

एक समय था जब राजपूत राजा हिरण, सूअर आदि का शिकार करना, उनके मांस का शेवन करना पसंद करते थे ये उनके शौक में शुमार होता था इससे उनकी बहादुरी का पता चलता था। सूअर के प्रति नफरत की भावना तो बहुत बाद में मुस्लिम शासकों के सम्पर्क में रहने के कारण विकसित हुई।

राजस्थान के कुछ खटीकों ने जैन पंथियों से प्रेरणा लेकर या अपनी जाति छुपाने के उद्देश्य से वीरवाल बनना स्वीकार कर लिया है। और नाम के साथ वीरवाल लिखना शुरू कर दिया है। वहीं कुछ लोग सिक्ख बन गए हैं लेकिन जब उन्हें अपने बच्चों की शादी करनी होती है तो उन्हें वापस अपने खटीक समाज की ओर ही मुड़ना पड़ता है। क्योंकि ज्यादातर खटीक, हिन्दू धर्म को ही मानते हैं।


खटीक जाति और संत कबीरदास

आज से करीब 600 वर्ष पूर्व लोधी वंश के समय में खटीक जाति के लोग किस व्यवसाय से जुड़े हुए थे यह महान दार्शनिक कबीरदास जी ने अपने शब्दों में वर्णन किया है जिससे हमें बोध होता है कि कबीरदास जी के समय भी खटीक जाति भेड़ बकरी और मांस के व्यापार में लिप्त थी।

संत कबीर जी ने इस तथ्य को बड़ी ही सुंदरता के साथ अपनी कबीर सागर में प्रस्तुत किया है:-

कबीर गाफिल क्या करे, आया काल नजीक । कान पकरि के ले चला, ज्यों अजियाहि खटीक ॥

अर्थात जब म्रत्यु नजदीक आती है तो कोई कुछ नहीं कर सकता जैसे बकरे की मृत्यु आने पर खटीक उसको कान पकड़कर खींचकर ले जाता है।

कबीर हरि सो हेत कर, कोरै चित ना लाये। बंधियो बारि खटीक के, ता पशु केतिक आये॥

कबीर कहते है की प्रभु से प्रेम करो। अपने चित्त में कूड़ा कचरा मत भरों। एक पशु कसाई के द्वार पर बांध दिया गया है तो समझो उसकी आयु कितनी शेष बची है।

आठ बाट बकरी गई, मांस मुल्ला गए खाय। आजहू खाल खटीक घर, भिस्त कहाँ ते जाय॥

आज से 600 वर्ष पूर्व भी खटीकों का कार्य बकरे काटना ही था। जब कबीरदास जी ने 600 वर्ष पूर्व ही यह दोहा लिख दिया तो जाहिर सी बात है खटीक कुछ सालों से नहीं बल्कि 600 साल से भी पहले से बकरे काटने का कार्य करते आ रहे हैं। कबीरदास जी कोई मामूली हस्ती नहीं हैं यह सब जानते हैं।

जो लोग खटीक समाज के किसी गौरवशाली इतिहास की आकांक्षा में भूतकाल को कुरेदने की कोशिश कर रहे हैं उनसे निवेदन है कि जो गुजर गया उसे गुजर जाने दो गड़े मुर्दे उखाड़ने से कुछ भी हासिल होने वाला नहीं है अभी तक किसी भी विद्वान को खटीक जाति का कोई भी गौरवशाली इतिहास किसी भी वेद, पुराण में उल्लेखित नहीं मिला है। इसलिए इतिहास में अपनी गौरवगाथा खोजने के बजाय अपना भविष्य सुधारिये और ताकि भविष्य में आपको आपके कार्यों के लिए जाना जाए।

खटीक जाति कब जागेगी?

मेरे खटीक जाति के भाइयों और बहनों आज में आपसे इस लेख के माध्यम से एक गंभीर विषय पर चर्चा करना चाहता हूँ । जैसा कि आप सब जानते है कि लोकतंत्र को लोगो का शासन कहा जाता है और जो जाति लोकतंत्र में अपने अधिकारों के लिए सड़क पर आँदोलन करती है उस जाति को अपने अधिकार मिल जाते है। खटीक जाति तो अभी तक अपने संवैधानिक अधिकार ही नही ले पाई है। क्योकि 12 राज्यो में खटिक जाति अनुसूचित जाति में है और बाकि राज्यो में पिछड़े वर्ग में हैं। तो कौन करेगा आँदोलन तुम्हारे लिए? कोई भी नही करेगा।

लोकतंत्र में अपने अधिकारों के लिए खुद ही लड़ना पड़ता है। सरकार को अपनी शक्ति दिखाने के लिए और अपनी बात सरकार से मनवाने के लिए बड़े बड़े आँदोलन करने ही पड़ते हैं। पिछले कुछ सालों से खटीक जाति पर अत्याचार बढ़ते जा रहे है। या यूं कहें अत्याचार काफी पहले से हो रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने से व हमारे समाज के पढ़ लिख जाने से हम अपने समाज पर हुए अत्याचार जान पा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में खटीक जाति की बेटी के साथ बलात्कार हुआ। कोई विरोध नही हुआ, कोई आँदोलन नही हुआ। राजस्थान में खटिक जाति के बेटे को घर मे जिन्दा जला दिया गया, कोई विरोध नही, कोई आंदोलन नहीं हुआ। औऱ लोकतंत्र में तो वही जाति आगे बढ़ती है जो सड़को पर उतरती है। अपनी ताक़त दिखाती है तो हम कब आदोलन करेगे, कब विरोध करेगे। हमे हमारे सवैधानिक अधिकार कौन दिलाएगा, कौन हम पर होने वाले अत्याचारों से मुक्ति दिलाएगा?

अब समय जागने का है सदियों से तो हम सो ही रहे है। इसलिए मेरे खटीक जाति के भाइयों जागो और आदोलन के माध्यम से अपनी ताकत दिखाओ। बहुत हो गए सम्मान समारोह, बहुत हो गये शादी समारोह। अब तो समय आंदोलन करने का आ गया है। अगर आंदोलन नही करोगे तो आज किसी और के साथ अत्याचार हुआ था कल तुम्हारी बारी आएगी।

इसलिए मेरे खटीक जाति के सभी नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सामाजिक संगठनों से ये निवेदन है कि अब समाजहित को देखते हुए समाज को आँदोलनकारी बनाओ। ताकि खटीक जाति को अपने संवैधनिक अधिकार मिल सके ओर अपने ऊपर होने वाले अत्याचारो का विरोध कर सके।

खटीक जाति में एकता की कमी - समस्या और समाधान

अनेक क्षेत्रीय संस्थाओं में विभक्त खटीक समाज को एकजुट, गतिशील, संगठित, संघर्षरत बनाने के लिए खटीक समाज की समस्त संस्थाओं को भंग करके लोकतान्त्रिक तरीके से मतदान करवाना चाहिए। आज काम कम और दिखावा ज्यादा हो रहा है। खटीक समाज से सम्बंधित संस्थाएं अपनी डफली अपना राग अलाप रहे हैं। आज स्वार्थ के चलते व खुद को बेहतर साबित करने के लिए हर कोई अपनी खुद की संस्था का राष्ट्रीय अध्यक्ष बन जाता है। कुकुरमुत्तों की तरह उगी इन तथाकथित राष्ट्रीय खटीक संस्थाओं का आलम यह है कि एक ही शहर में अनेकों संस्थाएं खोल दी गईं हैं उनका आपस में कोई संबंध या व्यवहार नहीं होता है। वे कोई भी कार्य मिलकर एकदूसरे के सहयोग से करने के लिए कभी संगठित होने की जरूरत महसूस नहीं करते हैं।

क्या इसी कार्यशैली से हमारे समाज का विकास हो सकेगा? बहुत सी खटीक संस्थाओं ने अपनी पूरी कार्यकारिणी की गतिविधियों, आगामी कार्ययोजनाओं व आय-व्यय का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया है ? केवल ईटिंग, मीटिंग, सिटिंग से कुछ नहीं होने वाला है। आज हमारे समाज के बुजुर्गगण खुद ही चौधरी बने रहना चाहते हैं, जबकि उन्हें समाज की बागडोर गुणवान युवाओं के हाथों में सौंप देना चाहिए तथा उनका मार्गदर्शन करना चाहिए यही समय की मांग है।

इतिहास गवाह है कोई भी लड़ाई केवल सुनियोजित योजना, लगन, परिश्रम के बल पर ही जीती जा सकती है।. हमें भेड़चाल की बजाय स्वतंत्र अस्तित्व बनाए रखने हेतु भी सोचना चाहिए। अधिकार मांगने से नहीं मिलते बल्कि छीनने पड़ते हैं। अंत में आप लोगों के साथ मैं अपनी पीड़ा शायरी के रूप में साझा कर रहा हूँ : "तकदीर का गम दुनियां का सितम, हर हाल पे सहना पड़ता है, शिकवे भी लवों पर आते हैं, खामोश भी रहना पड़ता है".....

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आज इतना संगठित कैसे है? करणी सेना इतनी संगठित कैसे है? क्योंकि उन्होंने अनेक स्थानीय संस्थाएं बनाने की जगह एक ही राष्ट्रीय संस्था का निर्माण किया है और उसी की शाखा पूरे भारत में कार्य कर रही हैं। तो खटीक समाज की इतनी सारी संस्थाएं क्यों खुली हुई हैं और खटीक समाज के ये ठेकेदार आखिर चाहते क्या हैं? भविष्य में हमारी सभी संस्थाएं मिलकर एक संस्था भले ही बन भी जाये लेकिन क्या पूर्व में ऐसे कदम नहीं उठाए गए? खटीक समाज की एक संस्था राष्ट्रीय संस्था होने का दावा करती है लेकिन कुछ साल पहले उसमें मतभेद हुए और संस्था दो टुकड़ों में बंट गई और एक ही नाम से अब दो संस्थाएं चल रही हैं तो हम समझ सकते हैं हमारे समाज के लोगों की मानसिकता कैसी है।

आजादी के 68 साल बाद आज भी खटीक समाज की स्थिति ठीक नहीं कही जा सकती है। आज भी उनके साथ सामान्य नागरिकों जैसा व्यवहार नहीं किया जाता है। वे आज भी शोषण और अत्याचार के शिकार हैं। अगर गहराई से देखें तो पायेंगें कि इनकी खराब स्थिति के लिए हमारे नेता ही मुख्य रूप से जिम्मेदार हैं। ये खुद नहीं चाहते हैं कि उनकी स्थिति सुधरे, वे यह जानते हैं कि अगर खटीक समाज की स्थिति सुधर गयी तो वे राजनीति किस पर करेंगे। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस युग में इस खटीक जाति में बहुत से समाजसेवी ऐसे भी हुए हैं जो मीटिंग तो करते हैं खटीक समाज की लेकिन उसमें किसी राजनीतिक पार्टी का खूब प्रचार किया जाता है। ऐसे नेता किसको मूर्ख बना रहे हैं? जाहिर सी बात है अपने समाज को ही मूर्ख बना रहे हैं।

उनका मुख्य मकसद अपनी राजनीति चमकाना है नाकि उनका सुधार करना । उनकी इस स्थिति के कारण ही वे आज संसद भवन और विधानसभा में बैठे हैं, तो फिर वे क्यों चाहेंगे कि उनकी स्थिति सुधरे। हमारे समाज के नेता अगर चाहें तो समाज को एकजुट करने के लिए पूरे राष्ट्र में खटीक समाज की अनेक संस्थाओं के स्थान पर सिर्फ एक ही संस्था बना सकते हैं लेकिन इसके पीछे उनका निजी स्वार्थ, अहं आड़े आ जाता है जिससे वे अपनी राजनीतिक चमकाने के लिए खुद की खटीक संस्था खोल लेते हैं और चंदा मांग मांगकर सम्मान समारोह कर करके नेताओं को यह दिखा देते हैं कि खटीक समाज के प्रतिनिधि सिर्फ वही हैं उन्हीं को अबकी बार चुनाव की टिकट दी जानी चाहिए। दलितों के घर मात्र खाना खा लेने से ही उनकी स्थिति में सुधार नहीं हो जाएगा।

इसके अतिरिक्त खटीक समाज कि खराब दशा के लिए वे लोग भी जिम्मेदार हैं जो अनुसूचित जाति के आधार पर आरक्षण का लाभ उठाकर उच्च शिक्षा प्राप्त करके वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, सेना अफसर, प्रोफेसर, डॉक्टर, इंजीनियर आदि तो बन गए हैं लेकिन दलितों की स्थिति और परिस्थिति सुधारने का कोई विशेष प्रयत्न नहीं करते हैं। उच्च पदों पर पहुँच कर खुद उन्होंने समाज की दशा और दिशा से मुँह मोड लिया है यहाँ तक कि अपनी जाति भी छुपाने लगे हैं। मिलने जाओ तो ऐसा व्यवहार करते हैं जैसे कि पहचानते ही नहीं, जब हम उन्हें बताते हैं कि हम खटीक समाज से हैं, तो संकुचित हो जाते हैं।

खटीक समाज अपनी अधिक संख्या होने के बावजूद सबसे कमजोर समाज साबित हुआ है क्योंकि हमसे निम्न समझे जाने वाले चमार, मीणा और वाल्मीकि आज हमसे बहुत आगे हैं उनमें आत्मविश्वास है वे खुलकर कहते हैं कि वे अनुसूचित जाति में आते हैं और अनुसूचित जाति होने का फायदा उठाकर वे सरकारी नौकरियों में घुस गए हैं और धनी व शिक्षित समाज बन चुके हैं। आज उनमें एकता है। हमारे समाज में एकता की घोर कमी है भाई ही अपने भाई को देखकर जलता है और एक दूसरे की मदद नहीं करते हैं। हमारे अंदर आत्मविश्वास की कमी है हम खुलकर यह कहने में शर्माते हैं की हम अनुसूचित जाति के हैं और अपनी जाति को छुपाने के लिए राजपूत, सूर्यवंशी, राणा जैसे उपनामों का इस्तेमाल करने लगते हैं अरे मेरे भाइयों अगर तुम टेलीविजन पर आओगे कि राणा साहब ने फलां काम किया है तो कौन जानेगा कि खटीक ने फलां काम किया है? इस तरह तो तुम अपने परिवार और मोहल्ले तक ही नाम रोशन कर पाओगे इसलिए खुलकर कहो कि हम खटीक हैं तभी बाकी खटीक जाति जान पाएगी कि कहीं तो कोई खटीक नाम रोशन कर रहा है। तभी अन्य समाज के लोग भी जान पाएंगे कि खटीक भी कोई होते हैं वरना कसाई के नाम से ही जाने जाते रहोगे।

हमारा समाज आज बुरी संगतों में पड़ा हुआ है शराब पीना बुरे काम करना। जबकि हमें अपने मन में अच्छे अच्छे विचार लाने चाहिए। हमें पैसा कमाने पर पैसे को सही जगह इन्वेस्ट करने पर और पैसे से और ज्यादा पैसा बनाने पर ध्यान देना चाहिए। क्योंकि पैसे के बिना ना आप कुछ सोच सकते हैं ना ही कहीं जाने का फैसला कर सकते हैं। जब पैसा हाथ में होता है तो नए नए विचार अपने आप दिमाग में आने लगते हैं।

अगर आप बेबीलोन का सबसे अमीर आदमी पढोगे तो आप जान जाओगे कि पैसे की अहमियत कितनी ज्यादा है आगे आगे तो महंगाई भी बढ़ती जा रही है अभी आपकी जितनी इन्कम है आने वाले समय में उसमें दाल रोटी खाना ही मुमकिन रह जायेगा। विदेश में जाकर छुट्टी मनाने का ख्वाब तो छोड़ ही दो। इसलिए बेबीलोन का सबसे अमीर आदमी पुस्तक को अमेजन से मंगाकर पढ़ो और अपने पैसे को आज से ही सही जगह इन्वेस्ट करना शुरू कर दो। जब आपके पास पैसा होगा तो आपके करीबी रिश्तेदार आपकी वास्तव में इज्जत करने लगेंगे। नए नए लोग आपसे दोस्ती करना चाहेंगे और आपको नए नए अवसर मिलने शुरू हो जाएंगे इसलिए अभी भी समय है। अच्छा काम करने की कोई उम्र नहीं होती है। पैसा कमाने के लिए अधिक पढ़ा लिखा होने या अच्छी नौकरी होने की भी कोई जरूरत नहीं है। यह भी जरूरी नहीं है कि आपके पिताजी गरीब थे तो तुम भी गरीब ही रहोगे। बल्कि तुम अपना भाग्य खुद लिख सकते हो।

अगर तुम इसकी शुरुआत करना चाहते हो लेकिन समझ नहीं आ रहा है कि शुरू कहाँ से करें तो मैं यानि सुनील बुटोलिया आपकी मदद कर सकता हूँ। मैं सन 2010 से खटीक समाज को एकजुट करने का प्रयास कर रहा हूँ इसके लिए मैंने सोशल मीडिया का सहारा लिया और वेबसाइट पर न्यूज़ प्रकाशित करने लगा इसके साथ ही यूट्यूब पर खटीक समाज की वीडियो डालीं। आप हमारे खटीक समाज के यूट्यूब चैनल से इस लिंक द्वारा जुड़ सकते हैं: youtube.com/c/khatiksamaj

खटीक ब्रांड - बड़े बिजनेस के हैं बड़े फायदे

आज इस लेख के जरिये हम ‘ब्रांड’ की ताकत को पहचानेंगे। तो सबसे पहले हम जानते हैं कि ब्रांड होता क्या है?

ब्रांड कोई भी उत्पाद या सर्विस का नाम होता है जो उसको मार्किट में उपलब्ध अन्य वस्तुओं से अलग पहचान दिलाता है। ताकि ग्राहक आसानी से उसकी पहचान करके दुकानदार से मांग सकें और कम्पनी द्वारा उसकी मार्केटिंग की जा सके।

कम्पनी इसको ट्रेडमार्क कराती है ताकि कोई दूसरी कम्पनी या व्यक्ति इस ब्रांड का इस्तेमाल करके उसके ग्राहकों को चुरा ना सके।

ब्रांड के बहुत से फायदे हैं जिनमें से कुछ यहाँ बताए गए हैं।

  1. ब्रांड से कम्पनी को पहचान मिलती है।
  2. ब्रांड से ग्राहकों का कम्पनी पर भरोसा बढ़ता है।
  3. ब्रांड होने से कम्पनी को इसका प्रचार करने में आसानी होती है।
  4. जो ब्रांड प्रसिद्ध होता है ग्राहक उसी के शेयर खरीदना पसंद करते हैं इससे कम्पनी वित्तीय रूप से मजबूत होती है।
  5. ब्रांड के साथ काम करने से कर्मचारियों में उत्साह रहता है।
  6. प्रसिद्ध ब्रांड अपनी तरफ अधिक ग्राहक आकर्षित करता है।

आपको टूथपेस्ट खरीदना हो तो भागे भागे जाएंगे और अपनी पसंद का टूथपेस्ट खरीदकर लाएंगे यह कोलगेट भी हो सकता है और बाबा रामदेव वाला भी हो सकता है। कोलगेट एक ब्रांड का नाम है यह इतना फेमस हो चुका है कि बहुत से ग्राहक तो उसमें भरे हुए पेस्ट को भी कोलगेट ही कहते हैं। यानि वे यह कहने की बजाय कि टूथपेस्ट खत्म हो गया है कहते हैं कि उनका कोलगेट खत्म हो गया है जबकि वे किसी भी ब्रांड का टूथपेस्ट इस्तेमाल करते हों।

अगर आपको कोई मोबाइल खरीदना हो तो आप कहाँ जाएंगे? आपका जवाब होगा मैं ब्रांडेड कम्पनी का फोन खरीदूंगा (जिस कम्पनी पर आप सबसे ज्यादा भरोसा करते हैं) और उसके रिटेल स्टोर पर जाऊंगा। या अमेजन पर ऑनलाइन बुक कर दूंगा। क्यों आप हर बार ब्रांडेड चीज ही खरीदना पसंद करते हैं? जबकि बिना ब्रांड की यानि लोकल चीज उससे बेहतर व कम दाम में आसानी से मिल जाती है? क्योंकि आप उस कम्पनी पर भरोसा करते हैं।

मुझसे यदि कोई पूछे कि अपना खाता किस बैंक में खुलवाऊं तो मेरा जवाब होगा कि आईसीआईसीआई में खुलवाओ क्योंकि खुद मेरा खाता भी इसी बैंक में है और मुझे इसकी सर्विस पसंद है। इस तरह फ्री में ही बैंक का प्रचार हो गया और उसके ग्राहकों में एक व्यक्ति और जुड़ गया। तो ब्रांड का फायदा जान गए आप?

हर अमीर व्यक्ति अपने बच्चों को दिल्ली पब्लिक स्कूल में ही क्यों पढ़ाना चाहता है जबकि सरकारी स्कूल के पढ़े हुए बच्चे भी आईपीएस/ आईएएस बनते हैं। क्योंकि दिल्ली पब्लिक स्कूल एक बड़ा ब्रांड है। मान लीजिए दिल्ली पब्लिक स्कूल वाले अपने स्कूल के नाम यानि ब्रांड को ट्रेडमार्क नहीं कराते तो क्या होता? हर गली हर नुक्कड़ पर दिल्ली पब्लिक स्कूल दिखाई देता और यह कभी भी एक बड़ा ब्रांड नहीं बन सकता था और इसकी इतनी बड़ी पहचान कभी स्थापित नहीं हो पाती।

आप मिठाई लाते हो तो पास की दुकान से लाते हो या बीकानेर से? बीकानेर के स्टोर पर जाकर देखिए कितनी भीड़ लगी रहती है अगर बीकानेर का मालिक गली में ही दुकान लगाता रहता तो क्या कभी उसको इतने अधिक ग्राहक मिलते? क्या कभी उसके ब्रांड की इतनी बड़ी पहचान स्थापित हो पाती? आज बीकानेर लाखों लोगों को रोजगार दे रहा है और इसके हजारों रिटेल स्टोर हैं।

जब ब्रांड में इतनी अधिक शक्ति है तो अब सवाल यह है कि खटीक समाज इस ब्रांड की ताकत को कैसे इस्तेमाल कर सकता है जिससे खटीक व्यापारियों को अधिक मुनाफा भी हो और पूरे खटीक समाज का भी भला हो जाय। उदाहरण के तौर पर खटीक समाज की अलग अलग जगह 10 कपड़े की दुकानें हैं सब छोटी छोटी दुकानें हैं। गली मोहल्ले में खोली गई हैं इनमें से किसी का भी एक दिन में 1000 रुपया का बिजनेस भी नहीं हो पाता है। यानि प्रत्येक दुकानदार 1000 रुपये से कम ही कमा पाता है।

जरा सोचिए किसी दिन कोई दुकानदार बीमार हो जाये या किसी की शादी, जन्मदिन में चला जाये तो दुकान को तो बंद ही करना पड़ेगा। जवाब मिलेगा हाँ! दुकानदार बोलेगा “इसी कारण तो मैं कहीं भी जाना पसंद नहीं करता हूँ। पूरा दिन दुकानदारी और घर की समस्याओं में ही गुजर जाता है कुछ और सोचने या करने की तो भूल ही जाओ। और अपने परिवार व बच्चों को भी समय नहीं दे पाता हूँ। कभी बच्चे के स्कूल में जाना भी पड़ता है तो दुकान को बंद करके जाना पड़ता है।” क्या यह दुकानदार अपने जीवन में कभी अलग अलग स्थानों पर अनेक दुकानें खोलने की सोच सकता है? जवाब होगा कभी नहीं। क्योंकि जो ठीक से एक दुकान नहीं संभाल पा रहा है वह अनेक दुकान कैसे खोलेगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि: ये दुकानदार अपनी दुकानदारी बढ़ाने के लिए ऐसा क्या करें कि ज्यादा से ज्यादा ग्राहक इनसे कपड़े खरीदने आएं?  और ब्रांड नामक बहुपयोगी चीज का इस्तेमाल करके यह कैसे अपने व्यापार बढ़ाएं। सवाल यह है कि: लोग इनसे कपड़े क्यों खरीदें क्या यह कोई ब्रांड हैं? नहीं यह कोई ब्रांड नहीं हैं इनको तो पूरी कॉलोनी जानती भी नहीं है। फिर ऐसा क्या करें कि पूरा शहर इनके पास कपड़े लेने आये और जो एक बार आये बार बार आये व दूसरों को भी इनके पास आने के लिए कहे?

इनमें से एक दुकानदार ने जवाब दिया कि अगर मैं किसी बड़े मॉल में दुकान खोल लूँ तो वाकई में 1 लाख रुपये के कपड़े रोज बेच सकता हूँ। लेकिन मेरे पास इतना पैसा नहीं है कि मैं वहां दुकान ले सकूं और इतना बड़ा काम संभाल सकूं। अब जवाब है कि इतनी बड़ी-बड़ी जो कम्पनियां हैं उनके पास पैसा कहां से आया? वे आज इतनी बड़ी कंपनियां इसलिए हैं क्योंकि कभी उन्होंने छोटी सी शुरुआत की थी। और धीरे धीरे उन्होंने कुछ बड़ा करने की सोची।

एक दुकानदार के पास पैसा नहीं है लेकिन यदि छोटे-छोटे 50 दुकानदार मिलकर एक कम्पनी का निर्माण करें और एक ब्रांड की रचना करें। वे सब मिलकर बड़े मॉल में या बड़ी मार्किट में शोरूम खोलें तो वाकई अब उनके पास इतने ग्राहक आने लगेंगे कि अब उन्हें काम को संभालने के लिए स्टाफ को रखने की जरूरत पड़ने लगेगी और वे दुकानदार (जो अब कम्पनी के मालिक बन चुके हैं) खुद आराम से दूसरे काम करने के लिए स्वतंत्र हो जाएंगे। अब वे आराम से रिस्तेदारी में घूमने जा सकते हैं किसी की शादी में शामिल हो सकते हैं और अपने कमाए हुए पैसे को कहाँ इन्वेस्ट करना है इस बारे में सोच सकते हैं। अब वे अपने परिवार व बच्चों के साथ समय बिता सकते हैं। किसी ने सच कहा है पैसे को पैसा कमाता है लेकिन शुरुआत तो आपको ही करनी होगी पैसा खुद आपकी जेब में नहीं चला आएगा। आपको कुछ बड़ा करना है।

मेरा यह उपाय सिर्फ कपड़े के व्यापार पर ही लागू नहीं होता है खटीक समाज के अन्य व्यापारी भी समान कार्यों को करने वाले व्यक्तियों के साथ मिलकर कार्य कर सकते हैं। और जब एक बार कम्पनी बन जाये तो फिर वो किसी भी काम को कर सकती है क्योंकि तब उसके पास काबिल स्टाफ रखने और रिस्क लेने की ताकत आ जाती है। अब वे अपने बिजनेस को बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक व एक्सपर्ट्स की मदद भी ले सकते हैं। ज्यादातर लोग आज गरीब हैं क्योंकि उनमें रिस्क लेने की ताकत नहीं होती। लेकिन एकता में शक्ति होती है संगठित होने के बाद रिस्क लेना और पैसे कमाना बहुत आसान हो जाता है।

शायद आपको न पता हो अमेरिका के तीसरे सबसे अमीर आदमी वारेन बफे के पास 50 कम्पनियां हैं और वे किसी कम्पनी को ऑपरेट नहीं करते बल्कि अधिकारियों को नियुक्त किया हुआ है। खुद आराम की जिंदगी जीते हैं एकदम टेंशन फ्री। हाल ही में उन्होंने अपनी संपत्ति का 80% धन दान कर दिया है। एक समय ऐसा भी था जब उनके पास पैसा नहीं था उन्होंने अपनी बुद्धि से शेयर मार्केट से पैसा कमाया और उस कमाए पैसे को एप्पल जैसी संगठित कम्पनियों में इन्वेस्ट किया। एप्पल कम्पनी को चाहे जो भी चला रहा हो लेकिन आज भी एपल कंपनी में वारेन बफे के सबसे ज्यादा शेयर यानि हिस्सेदारी है।

खटीक समाज और साहित्य

हमारे समाज के बारे में अन्य जाति के लोग व लेखक क्या सोचते हैं ?

लीलाधर जगूड़ी की “बची हुई पृथ्वी” कविता बहुत ही मर्मस्पर्शी है जो दिल को छू जाती है और हमारे देश की स्वार्थी व्यवस्था पर कुठाराघात करती है।

बलदेव खटिक जो कि बिजनौर के एक थाने में संतरी है कुछ ही दिन पहले उसने अपनी माँ को बिना दवाइयों के मरते हुए देखा है जब गांव से उसकी माँ की बीमारी का तार आया था तो उसको छुट्टी नहीं मिली थी फिर तीसरे दिन जब छुट्टी मिलने के बाद वह गांव जाता है तो अस्पताल व नजदीकी थाने वालों ने भी उसको गाड़ी नहीं दी। शाम को कुछ दवाइयां लेकर जब वह घर गया तो उसकी माँ मर चुकी थी। छुट्टी बढ़वाकर अपनी माँ का क्रियाकर्म करके अब वह सिर घुटवा कर ड्यूटी पर वापस आ चुका है, कोठरी जिसमें रंगतू (राशन की चोरी के अपराध में) बंद है उसके बाहर पहरा दे रहा है। हाथ में बंदूक है। और छाती पर गोलियों का पट्टा है।

थाने में उसी वक्त एक दुखिया अपनी शिकायत लेकर आता है और थानेदार से कहता है कि कुछ लोगों ने उसको पीटा है आप शिकायत लिख लीजिये। लेकिन थानेदार उसको कहता है कि जा जाकर गवाह लेकर आ जिसने तुझे पिटते हुए देखा हो। और किसी डॉक्टर से लिखवा भी लाना कि वाकई में तू पिटा ही है।

देवधर खटिक यह सब सुन रहा था अचानक वह पागल हो जाता है और अपनी बन्दूक से बाहर उड़ रहे कौवों को मार गिराता है और थाने से बाहर भाग जाता है। अब वह संतरी नहीं बल्कि बलदेव खटिक है वह माँ माँ चिल्लाता हुआ गांववालों से पागलों की तरह बात करता है। और रंगतू झोपड़ी में चला जाता है जहां अब कोई नहीं रहता। वही रंगतू जो कुछ दिन पहले राशन चोरी करने के केस में जेल में बंद हो चुका है उसकी बीवी बच्चे कहीं चले गए हैं। उस समय रंगतू को पकड़ने के लिए बलदेव खटिक भी आया था। शायद बलदेव व्यवस्था को बदलना चाहता है लेकिन बदलने में असमर्थ अपना दिमागी संतुलन खो बैठा है क्योंकि वह मरती हुई अपनी माँ की कोई मदद नहीं कर पाया था।

धर्मवीर भारती की पुस्तक धर्मवीर भारती ग्रंथावली की: बंद गली का आखिरी मकान कहानी में एक मुंशी जब बीमार हो जाता है तो उसका शरीर अकड़ जाता है वह बिना सहारे उठ नहीं सकता, खटिया में पड़े पड़े वह सोचता है कि आखिर मुझसे ऐसी क्या गलती हो गई जो बजरंगबली ने मुझे ऐसी सजा दी? मैं तो जाति से भी कायस्थ ब्राह्मण हूँ और इतने बड़े वकील के यहां मुंशी हूँ। मैंने तो चंदा इकट्ठा करके बजरंगबली को खेत से उठाकर उनका मंदिर बनवाया जो पहले खेत में पड़े हुए थे। कभी कोई अटिक-खटिक भले ही मंगलवार के दिन आकर उनको भोग लगा आता था वरना उनको वहाँ कोई नहीं पूछता था।

भगवानदास मोरवाल जी ने अपनी पुस्तक “पकी जेठ की दोपहर” में खटीक समाज के बारे में कुछ इस तरह वर्णन किया है। चौधरी मोहल्ले का एक उप मोहल्ला है खटीकवाड़ा। 1980 तक खटीकों के 8-10 परिवारों के इस मोहल्ले में बड़ी रौनक रहती थी। इसका चौक आल्हा ऊदल के किस्सों, बाजीगरों के इंद्रजाल से लेकर भालू नचाने वाले, बन्दर बंदरिया के खेल के अलावा पूरे बदन पर सिंदूर लीपने वाले और कमर में बेलों के गले में बंधने वाले घुंघरुओं को बांधकर उन्हें बजाते हुए। भोपाओं द्वारा एक दूसरे के हाथों में पड़ने वाली लम्बी चाबुक का खुला मंच था।

न जाने कितनी बार सारंगी के साथ बचपन में आल्हा ऊदल सुना था। इस खटीक जाति का इतिहास भी बड़ा दिलचस्प है। कहने को यह जाति अनुसूचित जाति है। मगर यह जाति कभी चमारों और भंगियों की तरह कभी अछूत या शूद्र नहीं रही। बल्कि यह एक व्यापारिक जाति है। दूसरी सवर्ण और पिछड़ी जातियों की तरह अछूतों और शूद्रों से दूरी बनाकर रखती है। भेड़ बकरियों को खरीदने व बेचने के साथ साथ यह जाति उनके चमड़े का व्यापार भी करती है। खटीक जाति की उत्पत्ति को लेकर मुझे (मोरवाल जी) जो एक किस्सा प्राप्त हुआ वह इस प्रकार है।

कुफल नाम का एक भक्त था। ब्रह्मा से उसने वरदान देने को कहा कि वह चोरी करने में निपुण हो जाये। भक्त के मांगने पर ब्रह्मा ने उसे यह वर दे दिया। यह कुफल के एक वंशज का नामकरण था जिसकी दो पत्नियां थीं- एक क्षत्राणी और दूसरी अहीरन। क्षत्राणी से राजपासी और भील उत्पन्न हुए, तो अहीरन से खटीक उत्पन्न हुआ। उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जो गाथाएं प्रचलित हैं उनसे पता चलता है कि पासी, अरख, खटीक और पचार एक ही वंश के हैं। यह भी कहा जाता है कि पुराने जमाने में पासियों की अबर के राजा से लड़ाई हुई कुछ पासी डर के मारे खटिया के पीछे छिपे गए वे खटीक कहलाये। और जो पासी अरख के नीचे छिप गए वे अरख कहलाये। चौधरी मोहल्ले के इसी खटीकवाड़े में एक ही गोत्र बल्कि कहिए एक ही परिवार के चार घर हैं।

  1. Jaffrelot, Christophe. A History of Pakistan and Its Origins. Anthem Press. p. 212.
  2. http://idsn.org/wp-content/uploads/user_folder/pdf/New_files/Nepal/Caste-based_Discrimination_in_Nepal.pdf